पर्यावरण संरक्षण आज केवल एक अभियान नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। शासन द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए निरंतर नवाचार और जनजागरूकता के प्रयास किए जा रहे हैं। ईकोफ्रेंडली वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित करने के साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों और गतिविधियों के माध्यम से आमजन को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने का कार्य किया जा रहा है।
इसी क्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कुशल नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में संचालित ”माटी गणेश-सिद्ध अभियान” पर्यावरण संरक्षण और भारतीय परंपराओं के सुंदर समन्वय का संदेश दे रहा है। अभियान के माध्यम से मिट्टी और गोबर से निर्मित गणेश प्रतिमाओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी मजबूत हो।
गणेशोत्सव की तैयारियों के बीच दतिया जिले में मिट्टी से गणेश प्रतिमाएं बनाने वाले कारीगरों के घरों में इन दिनों विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। रंग-बिरंगी मिट्टी से निर्मित आकर्षक गणेश प्रतिमाओं में कला और आस्था का ऐसा अद्भुत संगम दिखाई देता है कि मानो ये प्रतिमाएं सजीव हो उठी हों।
दतिया जिले की लगभग 75 वर्षीय श्रीमती बती प्रजापति अपने परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही इस पारंपरिक कला को आज भी पूरी लगन के साथ आगे बढ़ा रही हैं। वे बताती हैं कि उनका परिवार 40 वर्षों से अधिक समय से मिट्टी की विभिन्न वस्तुएं और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने का कार्य कर रहा है। उनका सात सदस्यीय परिवार पूरी तरह इसी पारंपरिक व्यवसाय पर निर्भर है।
मिट्टी के कुल्हड़, दीपक, गणेश प्रतिमाएं, मातारानी की प्रतिमाएं और विभिन्न प्रकार की मिट्टी से निर्मित कलात्मक वस्तुएं बनाना उनके परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है। गणेशोत्सव के अवसर पर उनके घर में इन दिनों विशेष रौनक है। परिवार के सभी सदस्य मिलजुलकर मिट्टी की सुंदर और आकर्षक गणेश प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हुए हैं। कोई प्रतिमाओं को आकार दे रहा है तो कोई उनमें रंग भर रहा है।
रंगों और कला के सुंदर संयोजन से तैयार हो रही ये प्रतिमाएं न केवल आकर्षण का केंद्र हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त संदेश दे रही हैं। इसी पारंपरिक कार्य को कर रहे श्रीराम प्रजापति बताते हैं कि उनके पूर्वजों से चली आ रही यह कला उनके परिवार के लिए केवल परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का प्रमुख साधन भी है।
जैसे ही कोई त्योहार आता है, परिवार के सभी सदस्य एकजुट होकर प्रतिमाओं और मिट्टी से बनी अन्य वस्तुओं को तैयार करने में जुट जाते हैं। गणेशोत्सव सहित विभिन्न पर्वों के लिए बनाई गई मिट्टी की प्रतिमाओं को दतिया एवं आसपास के बाजारों में बिक्री के लिए ले जाया जाता है। इससे परिवार को अच्छी आय प्राप्त होती है और घर का खर्च चलता है।
इस प्रकार पारंपरिक कला न केवल सांस्कृतिक विरासत को सहेज रही है, बल्कि परिवार के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी बनी हुई है। भारतीय संस्कृति में त्योहारों का विशेष महत्व है। हम हर पर्व को हर्षाेल्लास और उत्साह के साथ मनाते हैं। लेकिन आज समय की आवश्यकता है कि त्योहारों की खुशियों के साथ प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझा जाए।
माटी से बनी गणेश प्रतिमाओं को अपनाकर हम न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका को भी मजबूत बना सकते हैं। दतिया का प्रजापति परिवार अपनी मेहनत और पारंपरिक कला के माध्यम से यही संदेश दे रहा है कि मिट्टी केवल प्रतिमा बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, रोजगार और पर्यावरण संरक्षणकृतीनों को जोड़ने वाली हमारी अमूल्य विरासत है।
आइए, इस गणेशोत्सव हम सभी पर्यावरण अनुकूल मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं को अपनाएं और आस्था के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण का भी संकल्प लें। सुश्री निहारिका मीना सहायक संचालक जनसम्पर्क दतिया


